हिमाचल प्रदेश की आर्थिक मशीनरी को एक जबरदस्त झटका लगा है। 16वां वित्त आयोग ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है जिससे राज्य को 73 सालों बाद पहली बार 'रेवेन्यु डिफिसिट ग्रैंट' (RDG) नहीं मिलेगी। यह निर्णय सीधे तौर पर 2026 से 2031 तक के आर्थिक वर्षों को प्रभावित करता है, जो राज्य की अस्थायी स्थिति को और अधिक भंगुर बना देता है। मुख्यमंत्री ने इस मुद्दे पर पार्टी की बैठक बुलाई है और कहा है कि यह केवल राजनीति नहीं, बल्कि जनता के भविष्य से जुड़ा मामला है।
परिस्थिति इतनी गंभीर है कि 2019 से 2025 के बीच राज्य को लगभग 48,000 करोड़ रुपये इसी योजना के तहत मिल रहे थे। अब जब रास्ता रुका है तो अगले पांच वर्षों के लिए 50,000 करोड़ रुपये की उम्मीदों पर पानी फेर दिया गया है। कुल दायित्व आज 1.03 लाख करोड़ रुपये के आसपास है और अब अमेरिकी डॉलर के हिसाब से भी यह बोझ भारी होता जा रहा है।
73 साल पुराना सिलसिला टूटा
यह केवल एक साधारण बजट का मुद्दा नहीं है। यह 1952 से चालू हुआ रिवाज था कि केंद्र सरकार हरियाणा और अन्य छोटे राज्यों की तरह हिमाचल को नुकसान भरने के लिए पैसा देती थी। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुखू, हिमाचल प्रदेश सरकार ने इसे "आर्थिक शोषण" करार दिया है। उन्होंने बताया कि राज्य कभी भी आय धारक इकाई के रूप में डिजाइन नहीं किया गया था, इसलिए ऐसे अनुदान पर निर्भर रहना अनिवार्य था।
दूसरी ओर, उपायुक्त और विपक्ष के नेताओं की भी ध्यानपूर्वक गणना होती रही है। उप मुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने दावा किया है कि राजस्व की कमी अब 10,000 करोड़ रुपये की हो चुकी है। उनकी मानें तो केंद्र द्वारा यह कदम विशेष रूप से कांग्रेस शासित राज्यों को कमजोर करने की योजना का हिस्सा है। हालांकि, केंद्र सरकार का कोई स्पष्ट बयान अभी जारी नहीं हुआ है।
संसद में राजनीतिक लड़ाई
इस वित्तीय बवाल का असर सीधे विधान सभा में दिखा। हिमाचल विधान सभा बजट सत्रशिमला की शुरुआत 16 फरवरी 2026 को हुई थी, जहां दोनों पार्टियों के बीच जबरदस्त बहस देखने को मिली। विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने सभी दलों की बैठक से बाहर निकलने का फैसला किया था। वे 13 फरवरी को आई थीं लेकिन कुछ घंटों में ही वापस चली गईं।
- भाजपा के विधायकों का कहना था कि वे केंद्र सरकार के खिलाफ नहीं खड़े हो सकते।
- उधर, जय राम ठाकुरविपक्ष के नेता ने गृह मंत्रालय से स्पष्टीकरण मांगा कि उन्हें क्यों शामिल नहीं किया गया।
- सभापति कुलदीप सिंह पठानिया ने बहस चलाने की अनुमति देते हुए इसे नियमित कार्यवाही बता दिया।
इस बीच, कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खाड़े और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से दिल्ली में मुलाकात करके मामले को केंद्र तक पहुंचाने की कोशिश की गई।
अक्टूबर का बजट और कड़ी स्थिति
21 मार्च 2026 को जब मुख्यमंत्री ने बजट पेश किया, तो संख्याएं चौंकाने वाली थीं। कुल बजट 54,928 करोड़ रुपये का था, लेकिन इसमें राजकोषीय घाटा 9,698 करोड़ रुपये का आंकड़ा शामिल था। आम जनता के खर्च के हिसाब से देखा जाए तो हर 100 रुपये में से 27 रुपये केवल वेतन पर खर्च होंगे।
मंडी में वर्षा के दौरान हुए बाढ़ संबंधी मदद के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1,500 करोड़ रुपये की घोषणा की थी, लेकिन अभी वह धनराशि भी पूरी नहीं मिली है। यह स्थिति यह स्पष्ट करती है कि राज्य के पास बैकअप विकल्प बहुत कम हैं। अगर RDG बहाल नहीं हुआ तो विकास कार्यों में ठहराव जरूर आएगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
रेवेन्यु डिफिसिट ग्रैंट क्या होता है और इसकी जरूरत क्यों होती है?
यह केंद्र सरकार द्वारा दिए जाने वाला सीधा अनुदान है जो उन राज्यों को मिलता है जिनकी अपनी आय खर्च से कम होती है। हिमाचल जैसे क्षेत्रीय बाधाओं वाले राज्यों के लिए यह विकासात्मक कार्य करने के लिए जरूरी होता था।
क्या हिमाचल सरकार कर्ज चुका पائएगी?
वर्तमान में कुल ऋण 1.03 लाख करोड़ रुपये है। बजट में ब्याज भुगतान के लिए 13 रुपये प्रति 100 रुपये आवंटित किए गए हैं, लेकिन RDG बंद होने से यह चुनौती और बढ़ सकती है।
विपक्षी पार्टी का इस मामले में क्या रुख है?
भाजपा के विधायक विरोधाभासी स्थिति में फंस गए हैं क्योंकि वे अपने ही केंद्र सरकार के फैसले का समर्थन नहीं कर सकते और राज्य के हित में आवाज नहीं उठा सकते। उन्होंने सभी दलों की बैठक छोड़ दी थी।
अगले चरण में क्या कदम उठाए जाएंगे?
मुख्यमंत्री सुखू ने प्रधानमंत्री मोदी से व्यक्तिगत हस्तक्षेप करने की अपील की है और संसद में विवादित विधेयक पारित कराने की कोशिश करेंगे ताकि 275 और 280 अनुच्छेदों के तहत अधिकार फिर से सक्रिय हों।